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Welcome to Multani Ayurvedic Clinic

जन्म की तरह मृत्यु भी एक सच्चाई है, संसार में बहुत से लोग ऐसे होते है, जिनका जाना किसी को भी अच्छा नहीं लगता। जाहिर है कि उनकी यादें सदियों तक नहीं मिटती। ऐसे ही शख्स थे फखर ए तिब्ब हकीम व डाॅ. हरिचन्द मुलतानी मैडीकल रिसर्च स्कालर, पानीपत

हकीम डाॅ. हरिचन्द मुलतानी का जन्म 05 मई 1928 को कबीरवाला जिला मुलतान पाकिस्तान में एक जमीदार लाल बोधराज के घर में हुआ। बचपन में ही उनको सेवा की लग्न थीं। उन्होंने हकीम हाजिक की डिग्री प्राप्त करने के बाद कबीरवाला जिला मुलतान में एक छोटा सा दवाखाना स्थापित किया। शिव परमात्मा (खुदा) की कृपा से दवाखाना दिन प्रतिदिन उन्नति की ओर चलता गया। कुदरत की ओर से रोगियों को शफा वरदान के रूप में मिली हुई थी। जिस भी रोगी की वह चिकित्सा करते खुदा के फजल से शफा पाते। एक बार नायब तहसीलदार की चिकित्सा करने का अवसर मिला। उन्होंने ठीक होने के बाद उन्हें उपहार स्वरूप 3 किला जमीन दी।

एक दिन की बात है कि वह अपने दवाखाना कबीरवाला मुलतान में रोगियों का इलाज कर रहे थी कि एक महात्मा जी आये उन्होंने आशीर्वाद देकर कहा बेटा तेरे नाम का डंका सारी दुनिया में बजेगा अर्थात शोहरत और दौलत दोनों तेरे कदम चूमेंगे। यह भविष्यवाणी 1947 में देश के विभाजन के पश्चात सत्य सिद्ध हुई। बटवारे के बाद हिन्दुस्तान में आकर हकीम साहब की इज्जत को चार चांद लग गए। वह सब लोगों की दुआ तथा शिव परमात्मा की कृपा से हुआ। मैं तो उस महान शक्ति परवरदिगार का लाख बार शुक्रिया अदा करता हूँ कि उन्होंने मुझे उसे घराने में जन्म दिया जहां मुझे शोहरत तथा दौलत विरासत के रूप में मिली। 1947 में देश के विभाजन के पश्चात सत्य सिद्ध हुई। बटवारे के बाद हिन्दुस्तान में आकर हकीम साहब की इज्जत को चार चांद लग गए। वह सब लोगों की दुआ तथा शिव परमात्मा की कृपा से हुआ। मैं तो उस महान शक्ति परवरदिगार का लाख बार शुक्रिया अदा करता हूँ कि उन्होंने मुझे उस घराने में जन्म दिया जहां मुझे शोहरत तथा दौलत विरासत के रूप में मिली। 1947 में पाकिस्तान से आकर हिन्दुस्तान में पानीपत हरियाणा में ‘‘सुखदायक मुलतानी दवाखाना’’ स्थापित किया। इसके साथ ही ‘‘मुलतानी लेबाराट्रीज’’ भी स्थापित की जिसमें यूनानी दवाईयां तैयार की जाती थी। जिसकी सप्लाई हिन्दुस्तान के कोने-कोने में की जाती थी।

पाकिस्तान से एक उर्दू की मैगजीन निकलती थी जिसके प्रिंसीपल साहब ने उन्हें इसको तरतीब देने की तथा लेख लिखने की जिम्मेवारी सौंपी जो उन्होंने सहर्ष उसे स्वीकार कर लिया। हिन्दुस्तान व पड़ोसी देशों के लोगों को यौवन विज्ञान से सूचित करने के लिए अपनी लफानी रचनाओं की लड़ी आरम्भ करने का विचार उन्हें उन दिनों अधिक सताया करता था जब उन्होंने देखा कि लोग यौवन व गृहस्थ जीवन के गुप्त रहस्यों से अनभिज्ञ है और विभिन्न प्रकार की कच्ची धारणायें इनकी जीभ में उत्पन्न हो रही है। पुस्तकें और सुनी सुनाई बातें इस संबंध में प्रचलित है लोगों की सोच पर पुराने रिवाज और रूढ़ विचारों का पर्दा इतना मोटा है कि उनके हृदय और मस्तिष्क अंधे-गुंगे और बहरे हो गए है। उन्होंने मालिक दो जहान का नाम लेकर 1956 में कड़ी मेहनत से अपनी पहली पुस्तक जिसका टाईटल था ‘‘शादी की पहली रात’’ (सचित्र खास पुस्तक) इसकी सफलता के बाद गृहस्थी चाँदए मां और बच्चाए परिवार कल्याण व स्वास्थ्य, जवानी दीवानी, पुरुष रोग व सैक्स समस्यायें लिखनी आरम्भ कर दी। जिस समय यह पुस्तकें लिखी जा रही थी उस समय स्वप्न में गुमान नहीं थी कि एक दिन यह सब प्रयत्न देश के कोने-कोने में हिन्दुस्तान की इतनी बड़ी सेवा का कारण बन जायेंगे। 1960 में यौवन विज्ञान पर उनकी लिखी पुस्तक ‘‘जवानी दिवानी’’ के पहले संस्करण के प्रकाशन पर उन्हें बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा क्योंकि भूतपूर्व सरकार ने ‘‘जवानी दिवानी’’ के कुछ लेखों को कानून विरुद्ध करार देकर उन पर फौजदारी मुकदमा दायर कर दिया। किन्तु मित्रों की प्रार्थना और मालिक दो जहान की कृपा से विद्वान न्यायधीश ने उन्हें मैडीकल रिसर्च स्कालर मानते हुए मान के साथ बरी कर दिया।

डा. हरिचंद मुलतानी,

संस्थापक निराला जोगी,

पानीपत

डा. प्रेमनाथ मुलतानी,

सम्पादक निराला जोगी,

पानीपत

भारत में एक और नामवर ‘‘फखर ए तिब्ब’’ हकीम हरिचन्द मुलतानी पानीपत ‘‘मैडीकल रिसर्च स्कालर’’ उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मानित (1928-2000 ई.) ने युनानी चिकित्सा पद्धति को डूबती हुई नईया को संभाला। अर्थात इस पद्धति को सहारा दिया। जिन्होंने सारी आयु तिब्बी जगत की सेवा में बिता दी। शोहरत का डंका हिन्दुस्तान के अतिरिक्त पाकिस्तान तथा विदेशों में बजने लगा। उनकी मौत के बाद भी उनका नाम आज भी जिंदा है। इसको आगे बढ़ाने में अनेक सुपुत्र हकीम डा. प्रेमनाथ मुलतानी का विशेष सहयोग रहा है। यह केवल उनके आशीर्वाद का ही फल है कि हकीम डा. हरिचन्द मुलतानी के साथ-साथ हकीम डा. प्रेमनाथ मुलतानी का बहुमूल्य सहयोग और उत्साहवर्द्धन युनानी तिब्ब और आयुर्वेदिक प्रणाली जीवित रह सके और समस्त रोगी व चिकित्सकों को हर प्रकार के तिब्बी और व्यावसायिक सहयोग का आश्वासन दिलाते है और उनके सुझावों के इच्छुक है।

इसके पश्चात उच्चाधिकारियों और देश के ऊंचे मैडिकल जगत ने भी उनके प्रयत्नों को सराहा और इसे सबसे बड़ी मैडीकल सेवा माना। यही नहीं 18 मई 1973 को उन्हें प्ण्न्ण्ैण्छण्म्ण्च्ण्ब्ण् की ओर से तथा मानयोग भूतपूर्व राष्ट्रपति भारत श्री जी.एस. पाठक ने कर कमलों से फखर ऐ उर्दू प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया। उनका साहस बढ़ा और 80 के लगभग भारी मैडीकल पुस्तकें उन्होंने इसी लग्न से लिखी। अब यह मालिक दो जहान की देन है कि उनकी लिखी समस्त पुस्तकों ने लोकप्रियता के समस्त रिकार्ड तोड़ डाले हैं। ‘‘ताज उल हिकमत’’, ‘‘प्रैक्टिस आफ मैडीसन’’ और ‘‘ताज उल अकाकीर’’ हिन्दुस्तान की जड़ी बूटियों का इन्साईक्लोपीडिया, ‘‘ताज उल मुजरबात’’ को तो सबसे अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। क्योंकि यह पुस्तकें आयुर्वेदिक व युनानी कालेजों की लाईब्रेरियों में रखी गई है। जिससे समस्त भारत के प्रैक्टीशनर्ज लाभ उठा रहे हैं।

खुदा की नगरी में चोर

 

हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध लेखक हकीम डा. हरिचन्द मुलतानी मैडीकल रिसर्च स्कालर ‘‘फखर ए तिब्ब’’ उपाष्ट्रपति द्वारा सम्मानित जिनकी प्रसिद्धी का डंका समस्त तिब्बी जगत में बज रहा है के नाम से नकली पुस्तकें मलिक बुक डिपो लाहौर (पाकिस्तान) के नाम से दिल्ली व अन्य प्रांतों के लोग छापकर बेच रहे हैं और जनता को धोखा दे रहे है। यह समस्त पुस्तकें जो लाहौर के नाम से छपी है इसमें न तो पुरा मैटर है और नुस्खे भी गलत छपे है।

यदि किसी सज्जन को हकीम हरिचन्द मुलतानी के नाम से लाहौर का नाम लिखकर नकली पुस्तकें में छपे हुए गलत नुस्खे से नुकसान पहुंचता है तो किताब बेचने वाला स्वयं जिम्मेवार होगा न कि लेखक। नकल बेचने वाले के विरुद्ध ग्राहक कंज्यूमर कोर्ट में जा सकता है और उसके हर्जे, खर्चे की सारी जिम्मेवारी नकली किताब बेचने वाले पर होगी। जामा मस्जिद, दिल्ली दरिया गंज, दिल्ली, देवबन्द (यूपी) में हमारे नाम से जो नकली किताबें बेच रहे है, उनसे सावधान रहे।
हमारे नाम से नकली किताबें छापने से तो और कोई धंधा कर लेते ताकि नकली नुस्खों से लोगों की जान का कोई खतरा न होता। नकली किताबें बेचने वाले को लोग बददुआ देते हैं। जब लोग किताबें खरीद कर ले जाते है पता चला है कि यह तो नकली है तो उनके दिल पर क्या गुजरती है। यह नकली किताबें छापने वाले क्या जाने। मैं इन कुतब फरोशों से पुछता हूँ कि वह लाहौर का नाम क्यों छापते है अपना पता क्यों नहीं छापते। जब इन्सान से इतना डरते है तो उस मालिक दो जहान (खुदा) से क्यों नहीं डरते।

खुदा के घर देर है अन्धेर नहीं। वह तो हर इन्सान को कर्म करते हुए देख रहा है। मैं तो जहां के मालिक शिव परमात्मा का लाख बार शुक्र गुजार हूँ कि मुझे इतनी ताकत दी है कि मैं अपने पिता जी हकीम हरिचन्द मुलतानी जी के जाने के बाद भी उनके नाम को जिन्दा रख रहा हूं।

फानूस बन के जिसकी हिफाजत हवा करे।
वो शमां क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे।।

इससे ज्यादा मैं परवरदिगार से क्या मांगूं कि उनको लोगों की दुआयें अभी भी मिल रही है। दौलत तो हर कोई कमा सकता है, किन्तु शोहरत अल्लाह के फजल से मिलती है।

डा. हकीम प्रेमनाथ मुलतानी पानीपत

श्रद्धांजलि
हकीम डा. हरिचन्द मुलतानी
स्तुति पूज्यनीय हकीम डा. हरिचन्द मुलतानी
13वीं पुण्यतिथि 17 फरवरी 2013

हमारे पूजनीय विश्व प्रसिद्ध डा. हरिचन्द मुलतानी मैडीकल रिसर्च स्कालर उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मानित 100 से अधिक प्रसिद्ध उर्दू व हिन्दी मैडीकल व आयुर्वेदिक के लेखक।

 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुभूमो ते सड्रगस्वकर्माणि।।

 

आपके द्वारा प्रदत अनमोल संस्कार, जीवन श्रेष्ठ विचार, समाज हित, चिन्तन व लक्ष्य प्राप्ति तक अग्रसित रहने का दृढ़ संकल्प 13वीं पुण्यतिथि पर आपकी सुखद स्मृतियों को अक्षुण्ण एवं चिरस्थायी रखते है। हम सदा ऋणी रहेंगे तथा उपकी प्रेरणा व आशीष हमें सदैव प्रगति व प्रशस्ति देते रहेंगे।

 

अत्यन्त आदर सहित श्रद्धावन्त एवं समस्त
मुलतानी परिवार तथा निराला जोगी परिवार

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